भविष्य के लिए पैसे बचाना हर व्यक्ति के लिए बहुत जरूरी होता है। लेकिन पैसे
बचाना ही काफी नहीं है। इन पैसों को ऐसी जगह लगाना चाहिए जहां इनमें लगातार
बढ़ोतरी होती रहे। हर समझदार व्यक्ति धीरे-धीरे करके निवेश का एक पोर्टफोलिओ बनाता
है जिसमें निवेश के भिन्न विकल्पों- शेयर, सोना, म्यूचुअल फंड आदि का समावेश होता है। निवेश के कई विकल्प इसीलिए अपनाए जाते
हैं ताकि जोखिमों को कम करने में मदद मिल सके। इस लेख में हम उन बुनियादी बातों पर
चर्चा करेंगे जिन पर ध्यान देना पोर्टफोलिओ बनाते समय जरूरी होता है। आइए एक-एक कर
भिन्न विकल्पों की चर्चा करते हैं।
आपका पोर्टफोलिओ और शेयर
भिन्न कंपनियों के शेयर किसी भी निवेशक के पोर्टफोलिओ का खास हिस्सा होते हैं
क्योंकि निवेश के अन्य विकल्पों के मुकाबले इन्हें नकदी में बदलना आसान होता है।
इसके अलावा इनसे रिटर्न भी बेहतर मिलता है, लेकिन इनसे जुड़े जोखिम भी अधिक होते हैं। अपने
पोर्टफोलिओ के लिए शेयर चुनते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
निवेशक को हमेशा अच्छी कंपनियों का चुनाव करना चाहिए। अच्छी कंपनी पहचानने का
एक तरीका यह है कि इसने लगातार अच्छा मुनाफा दिया हो। अधिक पूंजीकरण वाली कंपनी
चुनने पर जोखिम कम हो जाता है।
जब निवेशक लंबी अवधि के नजरिए से निवेश करता है तो शेयर बाजार से जुड़े जोखिम
कम हो जाते हैं। लंबी अवधि का निवेशक कंपनी के विकास के साथ अपनी पूंजी में
बढ़ोतरी हासिल करता है। छोटी अवधि में शेयर की चाल कंपनी की बुनियादी बातों से
ज्यादा अन्य बातों जैसे महंगाई दर, बाजार का माहौल आदि से प्रभावित होती है।
हालांकि लंबी अवधि में शेयरों से अच्छा रिटर्न हासिल होता है लेकिन ऐसा हमेशा
नहीं होता। इसलिए अपने निवेश की समय-समय पर समीक्षा करते रहना चाहिए और उन शेयरों
को अपने पोर्टफोलिओ से बाहर कर देना चाहिए जो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं।
हर तीन महीने पर निवेश की समीक्षा एक अच्छी रणनीति मानी जाती है। इसके अलावा
निवेशक को अपने वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम सहने की क्षमता की भी समीक्षा करते रहना
चाहिए।
शेयरों की खरीद करते समय किसी खास सेक्टर पर दांव लगाना सही नहीं होता क्योंकि
किसी वजह से वह सेक्टर बुरा प्रदर्शन भी कर सकता है। इसलिए निवेशक को कई क्षेत्रों
की कंपनियों में पैसा लगाना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने पोर्टफोलिओ
में शेयरों का ढेर लगा दें। किसी भी निवेशक के पोर्टफोलिओ में 10 से 15 कंपनियों
के शेयर उसके लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होते हैं। अपनी पूंजी का दस
फीसदी से अधिक हिस्सा किसी एक कंपनी में नहीं लगाना चाहिए।
शेयर बाजार में निवेश के लिए उधार नहीं लेना चाहिए। यह दुधारी तलार की तरह
होता है। बेहतर यह है कि आप अपनी उस बचत को शेयर बाजार में लगाएं जिसकी जरूरत आपको
कम से कम अगले एक साल तक न हो।
अपनी पूरी पूंजी से शेयर खरीदना समझदारी नहीं है और हमेशा कुछ नकदी हाथ में
रखनी चाहिए। हर बड़ी गिरावट निवेशक को खरीदारी का मौका देती है क्योंकि ऐसे में
बड़ी कंपनियां भी सस्ती मिल जाती हैं। इस अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल ऐसे ही मौकों
पर करना चाहिए।
आपका पोर्टफोलिओ और सोना
सोना हर समझदार निवेशक के पोर्टफोलिओ का एक अभिन्न हिस्सा होता है। अपने
पोर्टफोलिओ को सोने की चमक देते समय निवेशक को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
यह महंगाई के खिलाफ हर निवेशक का सबसे बड़ा साथी होता है और राजनीतिक आर्थिक
संकट के वक्त अच्छे रिटर्न देता है। सोना तब सबसे अच्छा रिटर्न देता है जब शेयर,
एमएफ आदि विकल्प खराब
प्रदर्शन करते हैं।
आभूषण, सोने के बिस्किट और
सोने के सिक्के आदि खरीदना तुलनात्मक तौर पर महंगा पड़ता है क्योंकि इनके लिए
ज्वैलर या बैंक को बाजार भा से अधिक पैसा देना पड़ता है।
हमारे यहां बैंक खुद ही बेचे सोने के सिक्कों को भी नहीं खरीदते। ज्वैलर के
यहां बेचने पर हमें घाटा उठाना पड़ता है क्योंकि वे इसे डिस्काउंट पर खरीदते हैं।
ऐसे में सोने में निवेश का सबसे बेहतर उपाय गोल्ड ईटीएफ में निवेश है।
सोने के निवेशकों के लिए डॉलर की चाल भी खासी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में
सोने के निवेशक को डॉलर-रुपया निमय दर पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
ध्यान रखें, आपको तब तक घाटा या मुनाफा नहीं होता, जब तक आप बिक्री नहीं करते। सोने में निवेश से लाभ कमाने का
तरीका भी अन्य विकल्पों की तरह ही आसान है। आप गिरावट के वक्त सोना खरीदें और इसकी
कीमत में उछाल आने पर बिक्री कर दें।
आपका पोर्टफोलिओ और म्यूचुअल फंड
हर व्यक्ति के पास उतना समय नहीं होता कि वह शेयर बाजार या अन्य विकल्पों पर
लगातार नजर बनाए रखे। ऐसे लोगों के लिए म्यूचुअल फंड (एमएफ) एक बेहतरीन विकल्प है।
आइए यह देखें कि म्यूचुअल फंडों में निवेश से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के पास भिन्न योजनाएं होती हैं और सबसे मुश्किल काम
है सही एमएफ योजना का चयन। हर निवेशक अपनी वित्तीय जरूरत और सुविधा के हिसाब से इनका चयन कर सकता है। इसके
अलावा यह देखें कि योजना का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है। जानकारों के अनुसार,
वह इक्विटी एमएफ बेहतर है जो
मंदी के बाजार में अन्य योजनाओं के मुकाबले कम गिरावट का शिकार बने। पोर्टफोलिओ
एलोकेशन और डिविडेंड यील्ड आदि बातों का भी ध्यान रखना चाहिए।
बहुतेरे निवेशक पूंजी निवेश के लिए उचित समय का इंतजार करते रहते हैं। ध्यान
रखें कि बड़े से बड़ा जानकार भी उचित समय के बारे में सही आकलन नहीं कर सकता। ऐसे
में जरूरी है कि जितना जल्दी हो सके निवेश शुरू किया जाए और लगातार निवेश किया जाए
ऐसे में पूंजी में चक्रवृद्धि बढ़ोतरी होती है। बेहतर तरीका यह है कि एमएफ में
निवेश के लिए राशि तय कर दी जाए और उससे हर महीने एक निश्चित तारीख को यूनिटें
खरीदी जाएं (चाहे जितनी भी मिलें)। इसे एसआईपी कहते हैं और लगभग हर ओपन एंडेड फंड
में यह सुविधा उपलब्ध है।
अन्य विकल्पों की ही तरह एमएफ में निवेश करते समय भी हर निवेशक के मन में यह
सवाल होता है कि कितनी अवधि के लिए पैसा लगाया जाए। जवाब बिल्कुल आसान है। आप
जितना अधिक वक्त देंगे उतना अधिक रिटर्न मिलेगा। संदेश साफ है- एमएफ में लंबी अवधि
का निवेश करें।
केवल एक एमएफ योजना में निवेश करना सही नहीं होता। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं
कि पोर्टफोलियो में एमएफ योजनाओं की भीड़ एकत्र कर ली जाए। जरूरी है पोर्टफोलियो
में इक्विटी एमएफ योजनाओं और डेट एमएफ योजनाओं का संतुलन। इक्विटी योजनाओं में
ग्रोथ विकल्प और डेट योजनाओं में डिविडेंड विकल्प अपनाना बेहतर माना जाता है।
हर नए फंड ऑफर (एनएफओ) में निवेश करना समझदारी नहीं है। अगर उसी उद्देश्य की
योजना पहले से उपलब्ध है, जिस उद्देश्य के साथ एनएफओ आ रहा है, तो पहले से मौजूद योजना में निवेश करना बेहतर होता है। किसी
नई थीम के साथ आ रहे एनएफओ में निवेश एक बेहतर कदम हो सकता है।
कम एनएवी वाली योजनाओं को केवल इसी आधार पर तवज्जो देना सही नहीं है। किसी भी
मौजूदा एमएफ योजना में निवेश का निर्णय उसकी कम एनएवी या अधिक एनएवी के आधार पर
नहीं लेना चाहिए। किसी योजना से हासिल होने वाला रिटर्न ही उसके चयन का मानक होना
चाहिए भले ही उसका एनएवी अधिक ही क्यों न हो।
आपका पोर्टफोलिओ और बीमा योजनाएं
किसी भी निवेशक का पोर्टफोलिओ बीमा योजनाओं के बगैर पूरा नहीं होता। जीन बीमा
योजनाएं मुख्यत: मृत्यु लाभ देती हैं, जबकि साधारण बीमा योजनाएं बीमाधारकों के नुकसानों की भरपाई
करती हैं। लेकिन दुर्भाग्यश इन योजनाओं को सुरक्षा कर के बजाय निवेश के विकल्प के
तौर पर बेचा जाता है। बीमा पॉलिसी खरीदते समय आपको इन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
बीमा पॉलिसी बेचते समय एजेंट इस बात पर जोर देते हैं कि अमुक योजना से लंबी
अवधि में पूंजी निर्माण होगा। एजेंट इस बात को नजरंदाज कर देते हैं कि उस योजना से
बीमाधारक को पर्याप्त कर मिलेगा या नहीं। वे ग्राहकों को भविष्य के सुनहरे सपने
दिखा कर पॉलिसी बेचने की कोशिश करते हैं। एजेंट की ऐसी बातों में न आएं।
बीमा खरीदने से पहले आवश्यक है कि उसकी जरूरत तय कर ली जाए। उस घटना के होने
की संभावना कितनी है और उस घटना के घटित होने पर वित्तीय तौर पर कितना असर पड़ेगा,
इस आधार पर विचार करना
चाहिए।
ध्यान रखें कि बीमा कर खरीदना ही काफी नहीं है। यह कर पर्याप्त होना चाहिए।
जरूरत से काफी कम राशि का बीमा लेना बेमतलब है। यही नहीं, जरूरत से काफी अधिक राशि की बीमा पॉलिसी खरीदना भी
सही नहीं होता क्योंकि अच्छा-खासा पैसा प्रीमियम की अदायगी में चला जाता है।
कई बीमा योजनाएं खरीदने पर आपको धारा 80 सी के तहत कर में छूट हासिल होती है।
ऐसा अक्सर देखा जाता है कि एजेंट इस बात का फायदा उठाते हुए पॉलिसी बेचने की कोशिश
करते हैं। ध्यान रखें कि कर बचाना किसी पॉलिसी को खरीदने का प्रमुख कारण और
एकमात्र कारण नहीं होना चाहिए।
(मनी मंत्र में प्रकाशित)
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