Thursday, October 24, 2013

कुछ हल्का होगा उत्सव का उत्साह



नवरात्रि के साथ हिन्दू त्योहारों और उत्सवों का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया है जो अगले तीन महीनों तक जारी रहेगा। अक्टूबर में नवरात्रि, विजयादशमी, बकरीद और करवा चौथ के बाद नवंबर में धनतेरस, दीपावली, भैया दूज और छठ। दिसंबर में क्रिसमस और उसके बाद नए साल के जश्न। जहां ग्राहकों के लिए ये तीन महीने ढेर सारी खरीदारी के नाम होते हैं, वहीं कंपनियों और विक्रेताओं के लिए भी यह अपने उत्पाद बेचने का सुनहरा मौका होता है। 

ग्राहक अपनी बहुत सारी खरीदारी इन्हीं महीनों के लिए टालते रहते हैं, क्योंकि विभिन्न कंपनियां इस त्योहारी मौसम में उनको लुभाने के लिए तरह-तरह की आकर्षक छूट और उपहार लेकर बाजार में उतरती हैं। चूंकि विक्रेताओं को यह पता होता है कि ग्राहक इन महीनों में अपने बटुए का मुंह खोल देते हैं, ऐसे में वे तरह-तरह के उपायों जैसे नकद छूट, एक के साथ दो फ्री, ब्याज मुक्त किस्त आदि के जरिए अपने संभावित ग्राहकों को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं। 

अप्रैल-जून तिमाही में उपभोक्ता व्यय में वृद्धि साल-दर-साल महज 1.6 प्रतिशत रही है। इसकी वजह से इस तिमाही में देश के जीडीपी विकास की दर केवल 4.4 प्रतिशत रही। गौरतलब है कि पिछले साल इसी अवधि में उपभोक्ता व्यय में साल-दर-साल 4.3 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हुई थी। जहां तक कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables) क्षेत्र का सवाल है, जुलाई 2013 में इसने साल-दर-साल 9.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है, जबकि साल 2012 में इसने 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की थी। अगर तिमाही आंकड़ों की बात करें तो कंज्यूमर ड्यूरेबल्स क्षेत्र में अप्रैल-जुलाई 2012 की 6.1 प्रतिशत वृद्धि के मुकाबले इस साल 12 प्रतिशत की गिरावट आयी है। 

इस स्थिति के मद्देनजर विभिन्न उत्पाद कंपनियों ने अपनी बिक्री बढ़ाने और अधिक से अधिक ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए विशिष्ट रणनीतियां बनायी हैं, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) की ओर से पिछले दिनों उठाये गये कुछ कदमों से इन कंपनियों को निश्चित तौर पर झटका लगा है। इन्हें अपनी रणनीतियों में बदलाव करना पड़ रहा है।

आरबीआई के नवनियुक्त गवर्नर रघुराम राजन ने अपनी पहली मध्य तिमाही मौद्रिक नीति समीक्षा में 20 सितंबर को रेपो रेट में 25 अंक की बढ़ोतरी कर इसे 7.5 प्रतिशत कर दिया, जो तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया। आरबीआई ने इस समीक्षा में कहा कि महंगाई ऊंचे स्तरों पर बनी हुई है और परिवारों की वित्तीय बचत उतनी नहीं हो पा रही है, जितनी होनी चाहिए। 

लेकिन ऐसा नहीं लगता कि इस कदम के बाद इन परिवारों को वित्तीय मोर्चे पर वाकई कोई राहत मिलने वाली है। इसकी वजह यह है कि बड़ी खरीदारियों के लिए ये परिवार अक्सर बैंकों से ऋण लेते हैं और आरबीआई के इस कदम के बाद कार ऋण (Car Loan) और आवास ऋण (Home Loan) पर ब्याज दर में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है। इसके अलावा, बैंकों की ओर से क्रेडिट कार्ड ग्राहकों के लिए चलायी जाने वाली शून्य ब्याज जीरो परसेंट योजनाओं पर भी आरबीआई ने रोक लगा दी है। इसके अलावा केंद्रीय बैंक ने उन योजनाओं पर भी रोक लगा दी है जहां विभिन्न बैंक कुछ प्रॉसेसिंग शुल्क ले कर बड़ी खरीदारी को कई छोटी-छोटी किस्तों में बदलने का विकल्प अपने स्तर से अपने ग्राहकों को देते थे। 

शून्य ब्याज ईएमआई योजनाएं ग्राहकों के बीच लोकप्रिय हो गयी थीं। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी अधिसूचना में कहा, “शून्य ब्याज की अवधारणा का कोई अस्तित्व ही नहीं है और किसी कारोबार के उचित तरीकों के तहत यह आवश्यक है कि (बैंकों द्वारा) प्रॉसेसिंग शुल्क व ब्याज दरें एकसमान रखी जायें। ऐसी योजनाओं का उद्देश्य ग्राहकों को लुभाना और उनका दोहन करना है।” 

हालांकि इन योजनाओं में बैंकों की ओर से कोई ब्याज तो नहीं लिया जाता था, लेकिन आम तौर पर इस कर्ज के साथ एक प्रॉसेसिंग शुल्क जरूर जुड़ा रहता था। ऐसे में इन योजनाओं के तहत सामान लेने वाले ग्राहकों को नकदी देकर सामान लेने वालों के मुकाबले दोतरफा नुकसान होता था। एक ओर उसे विक्रेता द्वारा नकद खरीदारी पर दिए जाने वाले छूट से हाथ धोना पड़ता था, दूसरी ओर उसे प्रॉसेसिंग शुल्क भी अदा करना पड़ता था।

बैंक बाजार डॉट कॉम के सीईओ आदिल शेट्टी का कहना है कि आरबीआई हमेशा से शून्य ब्याज योजनाओं के खिलाफ रहा है और उसने पिछले दिनों अपनी इस घोषणा के जरिए अपने इरादों को गंभीरता से व्यक्त किया है। शेट्टी आगे कहते हैं, आरबीआई की इस घोषणा का समय गौर करने लायक है क्योंकि त्योहारी मौसम सिर पर है और इन्हीं दिनों ऐसी बिक्री तेजी पकड़ती है।
  
लेकिन इस कहानी का एक व्यावहारिक पहलू भी है। कुछ जानकार बताते हैं कि ऐसी योजनाओं का ग्राहकों के ऊपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इनका मानना है कि ग्राहक दो वजहों से ऐसी योजनाएं को प्राथमिकता देते हैं। एक तो उन्हें शुरुआत में कम अदायगी करनी पड़ती है और दूसरे, मनोवैज्ञानिक तौर पर ब्याज में राहत उन्हें नकदी में छूट से कहीं अधिक पसंद आती है। 

दरअसल क्रेडिट कार्ड (Credit Card) पर यह खरीदारी करते समय ग्राहक इस बात से अनभिज्ञ नहीं होते कि उनसे अतिरिक्त राशि वसूली जा रही है। लेकिन ग्राहक इन बातों को जानते हुए भी शून्य ब्याज वाली योजनाओं को प्राथमिकता देते हैं। 

कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर असर

इन योजनाओं पर लगायी गयी रोक का इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं और कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियों की बिक्री पर प्रभाव पड़ना तय है क्योंकि इन्होंने ऐसी योजनाओं को वापस लेना आरंभ कर दिया है। इसका असर खरीदारी के रुझान पर पड़ना स्वाभाविक है। रुपये की कमजोरी और मोटे तौर पर महंगाई बढ़ने की वजह से इनके उत्पाद पहले के मुकाबले कुछ महंगे भी हो चुके हैं। ऐसे में इन योजनाओं का अभाव इस त्योहारी मौसम में खरीदारी के उत्साह पर पानी डालने का काम कर सकता है। 


हालांकि इसके बावजूद कंपनियां उम्मीद कर रही हैं कि अक्टूबर-दिसंबर के दौरान इनकी मांग बढ़ सकती है। चूंकि मौसम त्योहारों का है और सवाल बड़ी बिक्री का है, ऐसे में जानकार इस बात का अंदेशा जता रहे हैं कि विक्रेता अलग तरीकों की रणनीति अपना सकते हैं। 

शेट्टी के अनुसार, एक ग्राहक के तौर पर अगर आप आकर्षक दाम पर कंज्यूमर ड्यूरेबल की खरीद करने वाले हैं और ऐसी कोई योजना आपके सामने रखी जाती है, तो विक्रेता से कुछ बुनियादी सवाल पूछने जरूरी हैं। ये सवाल पूछ कर आपको यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि वह विक्रेता इस तरह की योजना के नाम पर आपको क्या बेचना चाहता है। सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि पूरी राशि तुरंत देने पर क्या मुझे कोई छूट मिलेगी? दूसरा सवाल यह कि अगर इस योजना के जरिए सामान खरीदा जाये तो प्रॉसेसिंग शुल्क या अन्य शुल्क कितना लगेगा

अगर इन दोनों का जवाब मिलता है- कुछ नहीं, तो ऐसी योजना के तहत खरीद की जा सकती है। लेकिन ऐसी योजना मिलना व्यावहारिक तौर पर लगभग नामुमकिन है। इसलिए शेट्टी का कहना है कि जब तक आप पूरी तरह सुनिश्चित नहीं कर लेते कि आपको वाकई कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा, तब तक ऐसी योजनाओं से दूर रहना ही बेहतर है

गाड़ियों की धीमी बिक्री

एक ग्राहक के तौर पर असुविधाओं का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो रहा। देश का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) अब उन लोगों को कार के लिए कर्ज नहीं देगा जिनकी वार्षिक आय छह लाख रुपये से कम है। यही नहीं, एसबीआई ने कार के मूल्य का 0.51 प्रतिशत बतौर प्रोसेसिंग शुल्क (Procession Fee) लेना भी शुरू कर दिया है। हालांकि एसबीआई का दावा है कि ऐसा करने के बावजूद उसके ग्राहकों की संख्या में कमी नहीं आयेगी, लेकिन कार ऋण के संभावित ग्राहकों पर इसका असर पड़ना तय है। 

हालांकि इन ग्राहकों के लिए यह राहत जरूर है कि अन्य बैंकों ने ऐसे कदम नहीं उठाये हैं। अन्य बैंकों से कार लोन लेने के लिए वेतनभोगी व्यक्ति की न्यूनतम सालाना आमदनी 2.50 लाख रुपये होनी चाहिए। एसबीआई ने यह कदम तब उठाया है जब पिछले कई महीनों से कारों की बिक्री पर दबाव बना हुआ है और कार ऋण पर ऊंची ब्याज दरों को भी इसकी प्रमुख वजहों में से एक माना जा रहा है। 

अगर हम सितंबर में कार बिक्री के आंकड़ों को देखें तो केवल फोर्ड (Ford) और होंडा (Honda) की बिक्री में साल-दर-साल के आधार पर बढ़ोतरी दो अंकों में रही है। टाटा मोटर्स (Tata Motors), महिन्द्रा एंड महिन्द्रा (Mahindra&Mahindra), ह्यूंदै, टोयोटा जैसी कंपनियों की बिक्री सितंबर 2012 के मुकाबले कम रही है। बाजार में सबसे अधिक कारें बेचने वाली मारुति सुजुकी (Maruti Suzuki) साल-दर-साल केवल 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज करने में कामयाब रही है।  

त्योहारी मौसम को देखते हुए विभिन्न कार निर्माता ग्राहकों के लिए आकर्षक ऑफर लाती हैं और यह साल भी अपवाद नहीं है। बाजार से जुटायी जानकारियों के मुताबिक स्विफ्ट पर 25,000 रुपये, डिजायर पर 15,000 रुपये, इंडिका पर 40,000 रुपये, ए-स्टार पर 40,000 रुपये, स्कॉर्पियो पर 30,000-40,000 रुपये, सूमो गोल्ड पर 60,000 रुपये और आर्टिगा पर 40,000 रुपये तक की छूट दी जा रही है।  

इस बीच खबर यह भी है कि केंद्र सरकार ने बैंकों को दी जाने वाली पूंजीगत सहायता का बजट 14,000 करोड़ रुपये से अधिक करने का फैसला किया है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि चुनिंदा श्रेणी के उत्पादों- दोपहिया वाहनों, टेलीविजन, वाशिंग मशीन और रेफ्रिजरेटर आदि पर बैंक ब्याज दरें कम कर सकें। 

लेकिन आरबीआई की ओर से रेपो दर (Repo Rate) की बढ़ोतरी के बाद उल्टे बैंकों ने वाहन ऋण और आवास ऋण पर ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार की नयी पहले से उपभोक्ताओं को कितना फायदा होता है। 

गहनों की चमक भी फीकी

आभूषण बाजार में भी उत्साह कुछ खास नहीं दिख रहा है और जौहरी ग्राहकों की बाट जोह रहे हैं। गौरतलब है कि सितंबर के तीसरे हफ्ते में सरकार ने सोने और चांदी के आभूषण पर आयात शुल्क (Import Duty) 10 प्रतिशत से बढ़ा कर 15 प्रतिशत कर दिया था। सरकार ने इस कदम के पीछे मकसद यह बताया था कि इससे घरेलू आभूषण उद्योग को संरक्षण मिलेगा। 

लेकिन इस निर्णय से सोने और चांदी के आभूषण और महंगे हो गये हैं। इससे एक महीने पहले यानी अगस्त के दूसरे हफ्ते में सरकार ने सोने पर आयात शुल्क को बढ़ा कर 10 प्रतिशत कर दिया था। इस तरह एक महीने के भीतर पहले सोने पर और उसके बाद सोने और चांदी के आभूषणों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया गया। पहले से ही महंगाई की मार से बेजार आम आदमी आभूषणों की खरीदारी की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। 

हालांकि जौहरी यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि त्यौहारी मौसम के जोर पकड़ने के कारण अक्टूबर के दूसरे हफ्ते से ज्वैलरी की मांग में एक बार फिर से तेजी आ सकती है। जे पी ज्वैलर्स पटना के मालिक ज्वाला ठाकुर का कहना है कि बड़े ज्वेलरों के साथ-साथ छोटे ज्वैलरों ने भी नवरात्रि के पहले दिन से त्योहारी छूट की पेशकश की है, लेकिन पटना के आभूषण बाजार में ग्राहकों का टोटा है।  
बी सी सेन ज्वेलर्स (B C Sen Jewellers) गुड़गांव के शोरूम मैनेजर का कहना है कि अभी उनके यहां कोई फेस्टिवल ऑफर नहीं चल रहा है। हालांकि त्योहारी मौसम को भुनाने के लिए भोलासंस ज्वैलर्स करोलबाग में पांच अक्टूबर से हीरे के सभी आभूषणों पर उनके अंकित मूल्य पर सीधे 20 प्रतिशत छूट दी जा रही है। 

पीसी ज्वेलर (PC Jeweller) 30,000 रुपये या इससे अधिक के हीरे के आभूषण खरीदने पर एक ग्राम सोने का सिक्का मुफ्त दे रहा है। इसके अलावा पीसी ज्वेलर ने त्योहारों के दौरान 25,000 रुपये से अधिक की खरीदारी करने वालों के लिए बम्पर उपहार देने की भी घोषणा की है जिसमें 36 स्कोडा (Skoda) गाड़ियों के अलावा अन्य कई उपहार दिये जायेंगे। पीसी ज्वैलर रोहतक के शोरूम मैनेजर संजय तिवारी के अनुसार यह योजना पांच अक्टूबर से पांच नवंबर 2013 तक लागू है। 

उभर रहे हैं नये विकल्प

यातायात की दिक्कतों, ईंधन की कीमत में बढ़ोतरी, सुरक्षा कारणों और ऑनलाइन खरीदारी पर मिलने वाली छूट की वजह से लोग दुकानों में जा कर खरीदारी करने से परहेज करने लगे हैं। ऐसे में ऑनलाइन खरीदारी में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। इन त्योहारों के अवसर पर की जाने वाली खरीदारी में भी ऑनलाइन खरीदारी एक प्रमुख भूमिका अदा कर सकती है। 

उद्योग संगठन एसोचैम (Assocham) की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय ऑनलाइन (Online) खरीदारी का बाजार तकरीबन 52,000 करोड़ रुपये का है और इसमें हर साल 100 प्रतिशत की दर से वृद्धि दर्ज की जा रही है। उद्योग संगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में दस करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं और इनमें से 50 प्रतिशत लोग ऑनलाइन खरीदारी का विकल्प आजमाने लगे हैं। दिल्ली में रहने वाले लोगों में ऑनलाइन खरीदारी करने का यह चलन सबसे अधिक दिख रहा है। इसके बाद के पायदानों पर मुंबई और अहमदाबाद के लोग हैं।

(निवेश मंथन में प्रकाशित)

Wednesday, October 23, 2013

त्योहारी माँग से बढ़ सकती है सोने की चमक



अंतरराष्ट्रीय बाजार में पीली धातु की कीमतें अपने तीन महीने के निचले स्तरों के आसपास चल रही हैं और विशेषज्ञ छोटी अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसमें कमजोरी का रुख जारी रहने की संभावना जता रहे हैं। इतना जरूर है कि यह गिरावट अप्रैल 2013 जितनी तीखी होने की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है।

जानकारों का मानना है कि सुरक्षित निवेश या सेफ हैवेन के रूप में सोने की जो पहचान निवेशकों के मन में सालों से थी, वह अब धुंधली पड़ने लगी है। एंजेल ब्रोकिंग (Angel Broking) के एसोसिएट डायरेक्टर (कमोडिटीज एंड करेंसीज) नवीन माथुर कहते हैं, “अमेरिका में मौजूदा संकट के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट का रुख तो फिलहाल यही बताता है कि सेफ हैवेन के तौर पर इसका आकर्षण घटा है।यही नहीं, पिछले समय में अगर कभी डॉलर कमजोर हुआ है तो भी सोने को इसका कोई फायदा नहीं हुआ है। जानकारों का यह भी मानना है कि अमेरिका में सरकारी कर्ज सीमा (डेट सीलिंग) से संबंधित चिन्ताओं में कमी आने की स्थिति में इसकी कीमतों में और गिरावट आ सकती है। 

गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) जैसे बड़े निवेशक अपनी ईटीएफ होल्डिंग में भी कमी के लिए बिकवाली कर रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड ईटीएफ गोल्ड शेयर का भंडार अब घट कर महज 890 टन रह गया है, जो फरवरी 2009 के बाद का सबसे निचला स्तर है।  

तकनीकी विश्लेषण के लिहाज से भी सोने में मंदी का रुझान दिख रहा है। इस समय यह 1300 डॉलर प्रति औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे चल रहा है। तकनीकी विश्लेषक फिलहाल इसके लिए 1300 डॉलर प्रति औंस के आसपास ही एक कड़ा प्रतिरोध (Resistance) देख रहे हैं। जानकारों के अनुसार नीचे की ओर इसे 1245 डॉलर और 1210 डॉलर प्रति औंस के आसपास सहारा मिल रहा है। हालांकि अगर सोना अगस्त में बनाए गए अपने निचले स्तरों को तोड़ दे तो इसमें और कमजोरी आ सकती है। 

जेआरजी सिक्योरिटीज (JRG Securities) के सीनियर एनालिस्ट वाम्सी कृष्णा के अनुसार, अगले तीन महीनों में सोने की कीमत ठहरने (कंसोलिडेशन) की कोशिश करेगी और इसमें धीरे-धीरे हल्की तेजी का रुझान बन सकता है। लेकिन उनका कहना है कि इस दौरान उन्हें सोने में किसी खास तेजी की उम्मीद नहीं है और इस पूरी अवधि में यह 1450 डॉलर के नीचे ही रहने की संभावना है।  
  
अगले एक महीने के लिए कृष्णा का मानना है कि इस अवधि के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें नकारात्मक रुझान के साथ एक दायरे में रह सकती हैं। हालांकि, पिछले कुछ महीनों के उतार-चढ़ाव को देखते हुए कृष्णा ने अगले एक महीने के लिए काफी बड़ा दायरा दिया है। उनके अनुसार, ऊपर की ओर यह 1400-1420 डॉलर तक जा सकता है, जबकि नीचे की ओर यह 1150 डॉलर तक फिसल सकता है, हालांकि इसके 1180 डॉलर के स्तर छूने की संभावना अधिक दिख रही है। 

भारत में पिछले दिनों सोने के आयात शुल्क (import duty) में की गई बढ़ोतरी की वजह से यहाँ सोना अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुकाबले 12-15 प्रतिशत प्रीमियम पर चल रहा है। यहाँ 8-10 महीने पहले सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार के तकरीबन बराबर या 1-2 प्रतिशत प्रीमियम पर उपलब्ध होता था। जून 2013 से अब तक जहाँ अंतरराष्ट्रीय बाजार में महज 5 प्रतिशत बढ़त आयी है, वहीं भारत में कीमतों में 20 प्रतिशत तक की उछाल देखने को मिली है। रुपए में पिछले महीनों के दौरान आयी गिरावट का भी इस तेजी में योगदान रहा है। 

इसीलिए आने वाले समय में भारतीय बाजार में सोने की चाल काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगी कि रुपए का डॉलर के मुकाबले कैसा प्रदर्शन रहता है। अगर रुपए में मजबूती का रुख बना रहा तो ऐसी स्थिति में भारतीय बाजार में सोने की कीमत में गिरावट देखी आ सकती है। 

इस समय दिसंबर गोल्ड फ्यूचर्स (Gold futures) का भाव 28,400 के आसपास चल रहा है। माथुर कहते हैं कि अगले एक महीने की बात करें तो यह ऊपर की ओर 29,100 रुपए तक जा सकता है, जबकि नीचे की ओर इसके 28,000 रुपए तक फिसलने की आशंका है। 


मौजूदा अनिश्चितताओं को देखते हुए यह समझना आसान नहीं है कि आखिर सोना किस दिशा में बढ़ रहा है। माथुर कहते हैं, “हालांकि रुपए की चाल पर काफी कुछ निर्भर करेगा, लेकिन लंबी अवधि में सोने की दिशा ऊपर ही लग रही है। मौजूदा त्योहारी मौसम और शादियों के मौसम की वजह से देश में सोने की माँग उभरती नजर आ सकती है, जिसकी वजह से इसकी कीमतों में तेजी का रुख देखा जा सकता है।

हालांकि निचले स्तरों पर भारत में भौतिक रूप से सोने की माँग अभी है, लेकिन सोने के प्रति लोगों का आकर्षण अब से पांच साल पहले के मुकाबले कुछ कम जरूर हुआ है।
नवीन माथुर, एसोसिएट डायरेक्टर, कमोडिटीज एंड करेंसीज, एंजेल ब्रोकिंग 


अगले तीन महीनों में सोने की कीमत ठहरने (consolidation) की कोशिश करेगी और इसमें धीरे-धीरे हल्की तेजी का रुझान बन सकता है।
वाम्सी कृष्णा, सीनियर एनालिस्ट, जेआरजी सिक्योरिटीज  

(निवेश मंथन में प्रकाशित)

Friday, October 18, 2013

शट शट शटडाउन



सत्रह सालों के बाद एक बार फिर अमेरिका में शटडाउन (Shutdown) घोषित कर दिया गया है। इसकी वजह से 21 लाख संघीय कर्मचारियों में से तकरीबन आठ लाख को बिना वेतन के अवकाश पर भेजा जा रहा है। हालांकि, अमेरिकी मिलिटरी और सुरक्षा संबंधी अन्य एजेंसियां काम करना जारी रखेंगी, लेकिन नासा, इनवायरमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी (Environment Protection Agency) आदि को कामकाज बंद करना होगा। पिछली बार 1995-96 में यह स्थिति आई थी, जब अमेरिका में 28 दिनों तक शटडाउन रहा था। इसके बाद 2011 में भी हालात तकरीबन शटडाउन तक पहुंच गए थे। 

आइए सबसे पहले समझते हैं कि शटडाउन क्या है और ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हो गई है? शटडाउन एक ऐसी राजनीतिक स्थिति है जिसमें सरकार आवश्यक सेवाओं को छोड़ कर बाकी सेवाओं के लिए धन मुहैया कराना बंद कर देती है। राष्ट्रपति बराक ओबामा (Democrat) और वहां की विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी (Republican Party) के मध्य सहमति न बन पाने की वजह से संघीय बजट को तय समय सीमा के भीतर मंजूरी नहीं मिल पाने के कारण यह स्थिति आई है। अमेरिका में वित्तीय वर्ष 30 सितंबर को समाप्त होता है, लेकिन अमेरिकी सीनेट (Senate) और प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) इस समय सीमा के बीत जाने के बाद भी बजट पारित नहीं कर सकी हैं। दरअसल रिपब्लिकन पार्टी ने बजट पारित कराने के लिए यह शर्त रखी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी महत्वाकांक्षी हेल्थकेयर योजना (Obamacare) के प्रमुख हिस्सों को एक साल के लिए टाल दें। लेकिन ओबामा इसके लिए राजी नहीं हैं।
 
अमेरिकी बांड्स की यील्ड पर प्रभाव
अमेरिकी बांड्स (Bonds) की यील्ड (Yield) पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के पिछले संकटों के दौरान अमेरिकी की दस साल की ट्रेजरी बांड्स की यील्ड अधिकतम 100 बेसिस प्वाइंट्स तक गिरी है। मौजूदा स्थिति यह है कि यह सितंबर के अपने उच्चतम स्तर से 40 बेसिस प्वाइंट्स नीचे है। लेकिन कतई नहीं कहा जा सकता कि यह पूरी की पूरी गिरावट शटडाउन की वजह से ही हुई है। इसमें कुछ योगदान फेड द्वारा बांडों की खरीद जारी रखने के फैसले का भी है। जानकार मानते हैं कि यदि संकट कुछ और दिन चला तो इसमें 30-40 बेसिस प्वाइंट्स की गिरावट और आ सकती है।

जीडीपी ग्रोथ और डेट रेटिंग पर असर

अगला सवाल यह है कि अमेरिका की जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) पर इसका क्या असर होगा? जानकारों का मानना है कि शटडाउन जारी रहने की स्थिति में जीडीपी ग्रोथ की दर में हर हफ्ते 0.1 फीसदी से 0.2 फीसदी तक की गिरावट आती जाएगी। लेकिन असलियत यह है कि शटडाउन का यह सिलसिला अधिक लंबा नहीं चलेगा। इसके अलावा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि शटडाउन की वजह से अमेरिका की डेट रेटिंग (Debt rating) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। गौरतलब है कि अमेरिकी सॉवरेन डेट के लिए एसएंडपी (S&P) की रेटिंग एए+ (AA+) है।  

सोने की कीमत में गिरावट या तेजी

सरकारी शटडाउन को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के अपस्फीति कारक के तौर पर देखा जा रहा है। यह सोने के लिए नकारात्मक स्थिति है क्योंकि इसे मुद्रास्फीति (Inflation) के विरुद्ध हेजिंग (Hedging) के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि शटडाउन के बावजूद सोने में तेजी का रुख नहीं देखा जा रहा। यह खबर आने के बाद सोने की कीमत पिछले हफ्ते की शुरुआत में 1280 डॉलर प्रति औंस तक लुढ़क गईं, हालांकि शुक्रवार को सोना 1316 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ। जानकारों का मानना है कि संघीय कर्ज की सीमा से संबंधित संकट गहराने की स्थिति में सोने में तेजी का रुख आ सकता है।  

शेयर बाजार पर असर

शेयर बाजार के जानकारों का मानना है कि शटडाउन का अमेरिकी बाजारों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। पिछले कई दशकों के शटडाउन और शेयर बाजार के प्रदर्शन की बात करें तो शटडाउन से पहले बाजार में कुछ गिरावट अवश्य आती है लेकिन बाद में बाजार रिकवरी करने में कामयाब रहता है। जानकारों के अनुसार, अमेरिकी बाजार में तेजी का रुख जारी रहने की संभावना है, हालांकि शटडाउन की वजह से बाजारों में 5-7 फीसदी की करेक्शन आ सकती है। 

भारतीय निवेशकों पर प्रभाव

अमेरिकी सरकार के शटडाउन का भारतीय निवेशकों पर अभी तक कोई असर नहीं है, लेकिन यदि यह संकट लंबा चला तो भारतीय निवेशकों के लिए यह अच्छी बात होगी। यह शटडाउन अधिक लंबा खिंचने की स्थिति में अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उतना ही खराब असर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में अमेरिकी फेडरल रिजर्व को बांड खरीद के कार्यक्रम को और अधिक समय तक जारी रखना होगा, जो भारतीय बाजारों और निवेशकों के लिए शुभ संकेत होगा। गौरतलब है कि इस खरीदारी की समाप्ति के अंदेशे की वजह से डॉलर के मुकाबले रुपया अगस्त में ऐतिहासिक रूप से निचले स्तरों पर चला गया था। यही नहीं, फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) द्वारा यह कार्यक्रम जारी रखने की घोषणा के बाद रुपए में अपने निचले स्तरों से दस फीसदी की मजबूती आई है।

भारत के निर्यात पर असर

अमेरिकी शटडाउन की वजह से भारतीय आईटी कंपनियों में से अधिकांश के ऊपर न्यूनतम असर होने की संभावना है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी संघीय ठेकों पर भारतीय आईटी कंपनियों की काफी कम निर्भरता है, ऐसे में इनको कोई खास नुकसान नहीं होने वाला है। हालांकि इसकी वजह से अमेरिका को किए जाने वाले भारतीय निर्यात पर असर पड़ेगा, लेकिन यह नुकसान अधिक होने के आसार नहीं हैं। इंजीनियरिंग एक्सपोर्टर्स के संगठन ईईपीसी इंडिया (EEPC India) का कहना है कि वाणिज्यिक बंदरगाह आवश्यक सेवाओं की श्रेणी में नहीं आते, ऐसे में कर्मचारियों की कमी की वजह से बंदरगाहों से संबंधित सेवाओं जैसे सामानों की क्लियरिंग आदि में देरी होने की संभावना है। निर्यातकों को इससे नुकसान होगा। गौरतलब है कि साल 2012-13 में भारत द्वारा अमेरिका को किया गया निर्यात 36 अरब डॉलर रहा था।   

(पांच अक्टूबर 2013 को लिखा गया लेख)

बीमा में नए सुधारों का दौर!



बीमा क्षेत्र की नियामक संस्था बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (Irda) ने नए कलेवर वाले जीवन बीमा उत्पादों से संबंधित नियमों को लागू किए जाने की समय सीमा तीन महीने के लिए बढ़ा दी है। जीवन बीमा कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन जीवन बीमा परिषद (Life Insurance Council) ने इससे पहले इरडा से इस समय सीमा को बढ़ाने की गुजारिश की थी। समय सीमा बढ़ने का मतलब यह है कि जीवन बीमा कंपनियां (Life Insurance Companies) अगले तीन महीनों तक अपनी मौजूदा जीवन बीमा पॉलिसियां बेच सकेंगी। जानकारों के अनुसार यदि समय सीमा नहीं बढ़ाई जाती तो बीमा ग्राहकों के पास चयन के लिए काफी कम उत्पाद उपलब्ध होते। 

इरडा के इस निर्णय के बाद विभिन्न जीवन बीमा कंपनियों ने राहत की सांस ली है क्योंकि समय सीमा बढ़ने के बाद अब जीवन बीमा कंपनियां पुरानी योजनाओं को चरणबद्ध ढंग से बंद करते हुए धीरे-धीरे नई योजनाओं को शुरू कर सकती हैं। इरडा ने कहा है कि एक जनवरी 2014 से पुरानी बीमा योजनाओं को पूरी तरह बंद करना होगा।  

हालांकि, बीमा कंपनियों को यह कहा गया है कि वे हाइएस्ट एनएवी गारंटी योजनाएं (Highest NAV Guarantee Schemes) और इंडेक्स-लिंक्ड बीमा योजनाएं एक अक्टूबर से ही बंद कर दें। इन बीमा उत्पादों को छोड़ कर बाकी जीवन बीमा उत्पादों के लिए बीमा नियामक ने यह समय सीमा इसलिए बढ़ाई है क्योंकि अधिकांश बीमा कंपनियों खास तौर पर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC of India) ने नए नियमों के अनुपालन वाले उत्पाद उसके पास सितंबर के आखिरी हफ्ते में पेश किए। जानकारों का कहना है कि केवल उत्पादों को बेहतर करने से ग्राहकों का भला नहीं होगा। ग्राहकों को वास्तव में लाभ तभी होगा जब बीमा नियामक उत्पादों की बिक्री से जुड़ी गड़बड़ियों पर ध्यान देगा। गौरतलब है कि बीमा क्षेत्र में मिस-सेलिंग (गलत जानकारी दे कर उत्पाद बेच देना) एक गंभीर समस्या है और बीमा नियामक को मिलने वाली शिकायतों में आधे से अधिक इसी से संबंधित होती हैं। 

इसके अलावा बीमा नियामक संस्था ने स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) से संबंधित उन नियमों में कुछ संशोधनों की घोषणा की है जो इसने फरवरी 2013 में अधिसूचित किए थे। इरडा द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया है कि बीमा कंपनियां नॉन-एलोपैथिक उपचार के लिए भी कुछ शर्तों के साथ स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करा सकती हैं। ऐसे उपचारों के लिए पॉलिसी धारक को स्वास्थ्य बीमा कवर तभी मिल सकेगा यदि उसने किसी सरकारी अस्पताल में अपना उपचार कराया हो या फिर किसी ऐसी संस्था में उपचार कराया हो जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हो या क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया/ नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड ऑन हेल्थ द्वारा प्रमाणित हो। इस व्याख्या के बाद इससे संबंधित भ्रम समाप्त हो गया है। इसके अलावा इरडा ने कहा है कि अब केवल नई व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में एक फ्री-लुक पीरियड (Free-look Period) होगा, जो उस पॉलिसी की शुरुआत के समय लागू होगा। हालांकि एक साल से कम अवधि वाली नई व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा योजनाएं इस दायरे में नहीं आएंगी। ये बदलाव एक अक्टूबर से लागू हो गए हैं। 

(चार अक्टूबर 2013 को लिखा गया लेख)