अनिश्चितताएं हम
सबकी जिन्दगी का हिस्सा होती हैं। इन अनिश्चितताओं की वजह से ही बीमा की जरूरत
पड़ती है। कोई व्यक्ति जीवन बीमा पॉलिसी खरीद कर अपने जीवन का बीमा करा सकता है।
इसी तरह विभिन्न बीमा उत्पादों के जरिए मोटरसाइकिल, कार, घर, जेवरात आदि का भी बीमा कराया जा सकता है। लेकिन
विविध निवेश विकल्पों जैसे म्यूचुअल फंड या शेयरों के मामले में ऐसा नहीं है
क्योंकि कोई भी बीमा कंपनी इनका बीमा नहीं करती। चूंकि इनका सीधा संबंध बाजार से
है ऐसे में इनके साथ काफी अधिक जोखिम जुड़ा होता है। जब बाजार में अचानक तेजी से
गिरावट आती है तो निवेशकों को काफी घाटा उठाना पड़ता है और इस घाटे से बचने के लिए
उनके पास कोई उपाय नहीं होता। ऐसी स्थिति में निवेशकों का बाजार से मोहभंग हो जाता
है और वे बचे पैसों को निकाल कर अपने कारोबार में लगा देते हैं या फिर सोना या
प्रॉपर्टी जैसे पारम्परिक निवेश विकल्पों में। जिन निवेशकों की जोखिम लेने की
मानसिकता नहीं होती, वे लोग अपनी
पूंजी बैंक एफडी, एनएससी, पीपीएफ या पोस्ट ऑफिस की जमा योजनाओं में लगा
देना बेहतर समझते हैं, परंतु बाजार से
दूर रहते हैं। लेकिन अब ऐसी संकल्पना विकसित कर ली गई है जो उतार-चढ़ाव और गिरावट
वाले माहौल में भी निवेशकों की पूंजी को सुरक्षित रखती है। इसे पोर्टफोलियो
इन्श्योरेन्स का नाम दिया गया है।
क्या है
पोर्टफोलियो इन्श्योरेन्स
हालांक
पोर्टफोलियो इन्श्योरेन्स किसी बीमा योजना का नाम नहीं है, लेकिन यह काफी हद तक बीमा योजना की ही तरह है। पोर्टफोलियो
इन्श्योरेन्स के तहत एक ऐसा पोर्टफोलियो बनाया जाता है जो किसी अवांछित घटना की
स्थिति में निवेशक की पूंजी को नष्ट होने से बचाता है। असल में सही तरीके से लागू
किए जाने पर यह न केवल लंबी अवधि के रिटर्न में बढ़ोतरी करता है, बल्कि साथ ही साथ गिरावट के जोखिम को भी कम
करता है। इन्वेस्टोपिडिया ने पोर्टफोलियो इन्श्योरेन्स को एक हेजिंग तकनीक के तौर
पर व्याख्यायित किया है। इसके अनुसार, पोर्टफोलियो इन्श्योरेन्स एक ऐसा तरीका है जिसमें इंडेक्स फ्यूचर्स को शॉर्ट
सेल कर बाजार के जोखिम से पोर्टफोलियो की हेजिंग की जाती है। जब बाजार की दिशा
अनिश्चित होती है या बाजार में उतार-चढ़ाव अधिक होता है तो संस्थागत निवेशक इस
हेजिंग तकनीक का काफी इस्तेमाल करते हैं। इंडेक्स फ्यूचर्स की शार्ट सेलिंग से
किसी भी गिरावट की तो भरपाई हो जाती है, लेकिन साथ ही साथ यह फायदे को भी सीमित कर देता है।
लेकिन इस परिभाषा
से आगे जाते हुए पोर्टफोलियो इन्श्योरेन्स की कई रणनीतियां बनाई जा चुकी हैं जो
निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा और पूंजी को सुरक्षित रखने की जरूरत पर आधारित
हैं। आइए एक-एक करके इन रणनीतियों पर चर्चा करते हैं।
खरीदें और होल्ड करें
पोर्टफोलियो
इन्श्योरेन्स की विभिन्न रणनीतियों में यह काफी लोकप्रिय रणनीति है। इस रणनीति के
तहत एक पोर्टफोलियो मिक्स (उदाहरण के तौर पर इक्विटी और डेट का अनुपात 65:35 रखते हुए) तैयार किया जाता है। इसके बाद एक
निश्चित समयावधि तक इन एसेट्स को होल्ड करके रखा जाता है। अगर पोर्टफोलियो में
इक्विटी का अनुपात अधिक है और नजरिया लंबी अवधि का है तो यह रणनीति काफी बेहतर
प्रदर्शन करती है क्योंकि लंबी अवधि में (8-10 सालों में) आम तौर पर इक्विटी का प्रदर्शन अन्य निवेश
विकल्पों के मुकाबले बेहतर रहता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति गलत शेयरों का चुनाव कर
लेता है तो उसकी पूंजी के नष्ट होने का जोखिम काफी बढ़ जाता है। ऐसी दशा में उस
व्यक्ति की पूंजी उस अनुपात में न केवल सुरक्षित रहती है बल्कि सामान्य रिटर्न भी
देती है जिस अनुपात में उस पोर्टफोलियो में डेट निवेश है। इस रणनीति की खासियत यह
है कि यह बुल फेज में काफी बेहतर प्रदर्शन करती है और अधिकतम रिटर्न देती है।
दूसरी बात यह है कि इसे लागू करना बेहद आसान है।
सतत मिश्रण
इसके अलावा कुछ
और रणनीतियां हैं जिनके द्वारा पोर्टफोलियो की सुरक्षा की जा सकती है। सतत मिश्रण
की रणनीति इससे पहले बताई गई खरीदें और होल्ड करें की रणनीति से एक कदम आगे बढ़ती
है। इस रणनीति के तहत जब डेट और इक्विटी का पोर्टफोलियो मिक्स बनाया जाता है तो न
केवल इस पर लगातार करीबी निगाह रखी जाती है बल्कि एक निश्चित समयावधि के लिए उसका
अनुपात भी बनाए रखा जाता है। इस रणनीति के तहत लगातार समीक्षा करने के लिए एक वक्त
तय किया जाता है और कड़ाई से उसका पालन किया जाता है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति एक
ऐसा पोर्टफोलियो मिक्स बनाता है जिसमें इक्विटी और डेट का अनुपात 65 और 35 का है। उसके बाद उसे समीक्षा का वक्त तय किया जाता है। मान लीजिए उसने यह तय
किया कि वह हर तिमाही इस पोर्टफोलियो की समीक्षा करेगा। हो सकता है कि अगली तिमाही
तक शेयर बाजार में तेजी आई हो और इसकी वजह से शेयरों की कीमत बढ़ गई हो। ऐसे में
उसके पोर्टफोलियो में इक्विटी का अनुपात भी बढ़ गया होगा। इस रणनीति के तहत
समीक्षा के वक्त अतिरिक्त इक्विटी हिस्से की इस तरह बिक्री करेगा कि इक्विटी और
डेट के बीच का शुरुआती अनुपात (65:35) बरकरार रहे। और अगर बाजार नीचे जाता है तो वह व्यक्ति और इक्विटी खरीदता है
ताकि वही अनुपात बना रहे। विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया है कि लंबी अवधि में
इस तरीके के जरिए पूंजी को सुरक्षित रखने में सफलता पाई गई है चाहे बाजार का माहौल
जैसा भी हो। सतत मिश्रण की इस रणनीति की खासियत यह है कि यह सभी तरह के बाजार में
अच्छा प्रदर्शन करती है। इस रणनीति को अपनाने के बाद पोर्टफोलियो में तेजी और
गिरावट दोनों पर लगाम लग जाती है।
अपरिवर्ती रणनीति
इस रणनीति में
निवेशक अपना पोर्टफोलियो इस तरह बनाता है कि अगर उसका इक्विटी का हिस्सा घट कर
शून्य हो जाता है तो भी उसकी शुरुआती पूंजी बरकरार रहती है। इस रणनीति में डेट का
अनुपात अधिक रखा जाता है। पोर्टफोलियो बनाते समय डेट और इक्विटी का अनुपात इस तरह
रखा जाता है कि तय समयावधि के भीतर डेट से उतना रिटर्न मिल जाए जितनी पूंजी
इक्विटी में लगाई गई है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति अपना पोर्टफोलियो बनाते समय
पांच सालों का नजरिया रखता है तो वह मोटे तौर पर डेट व इक्विटी के बीच 65:35 का अनुपात रखता है। अगर बाजार का हाल काफी खराब
रहा और इक्विटी में लगाई गई पूंजी शून्य हो गई तो डेट में लगाई गई पूंजी से उतना
रिटर्न मिल जाएगा कि वह व्यक्ति पांच साल के बाद उतनी राशि पा सकेगा जितनी कि आरंभ
में लगाई गई थी। अत: पोर्टफोलियो के मूलधन को नष्ट होने से बचाने के लिहाज से यह
रणनीति बेहतरीन है। ऊंची ब्याज दरों के माहौल में यह रणनीति काफी आकर्षक हो जाती
है क्योंकि तब डेट विकल्पों में अधिक पूंजी लगाई जा सकती है।
फ्यूचर्स-संबंधित
रणनीति
इसके अलावा
पोर्टफोलियो इन्श्योरेन्स की एक और रणनीति है जिसके जरिये शेयरों के या इंडेक्स के
फ्यूचर्स की मदद से कोई निवेशक बाजार के जोखिम से अपनी पूंजी को बचाता है। बाजार
में भारी गिरावट की संभावना की स्थिति में फ्यूचर्स में शॉर्ट सेलिंग एक लोकप्रिय
तरीका है। अगर किसी व्यक्ति ने किसी सूचकांक के कुछ प्रमुख शेयरों में निवेश किया
है या फिर इक्विटी-आधारित म्यूचुअल फंड योजना में पैसे लगाए हैं और बाजार के जोखिम
की हेजिंग करना चाहता है तो वह उस सूचकांक के फ्यूचर्स की शॉर्ट सेलिंग की मदद से
ऐसा कर सकता है। बाजार के नीचे जाने की स्थिति में यह रणनीति अच्छा प्रदर्शन करती
है। लेकिन जब बाजार ऊपर जाए या फिर उन्हीं स्तरों के आसपास घूमता रहता है तो फिर
फ्यूचर्स की शॉर्ट सेलिंग के कारण मुनाफा घट जाता है। ऐसे में निवेशक को यह तय
करते हुए यह रणनीति अपनानी चाहिए कि उसके पूरे पोर्टफोलियो में कितने का निवेश
होना है और उसके कितने फीसदी के लिए वह फ्यूचर्स की रणनीति का इस्तेमाल करेगा।
(मनी मंत्र में प्रकाशित)
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