Sunday, February 24, 2013

आम निवेशकों के लिए सेबी का सेफ्टी नेट



पूंजी बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने पिछले दिनों छोटे निवेशकों के हित में कई कदम उठाए हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इसने आईपीओ (IPO) में निवेश करने वाले रिटेल निवेशकों को सेफ्टी नेट (Safety Net) उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। सेबी ने कुछ महीने पहले अपनी वेबसाइट पर इस बारे में एक डिस्कशन पेपर जारी किया था। इसके कई प्रावधान खासे विरोधाभासी हैं और अजीब भी।

लेकिन बात को और आगे बढ़ाने से पहले यह जानना जरूरी है कि सेबी इस तरह की व्यवस्था क्यों करना चाहता है?

क्यों पड़ी जरूरत?

अपने इस डिस्कशन पेपर में बाजार नियामक ने इस सवाल का विस्तृत जवाब दिया है। सेबी ने कहा है कि पिछले कुछ सालों के दौरान आए आईपीओ के लिस्टिंग (Listing) के बाद के प्रदर्शन को देखते हुए बोर्ड इस नतीजे पर पहुंचा है कि आईपीओ की प्राइसिंग में स्व-अनुशासन लाने के लिए डिस्क्लोजर के अलावा अन्य उपाय किए जाने जरूरी हैं। इससे पहले 31 जुलाई 2012 को प्राइमरी मार्केट एडवाइजरी कमिटी (पीएमएसी) की बैठक में यह राय बनी कि पूंजी बाजार में निवेशकों के विश्वास की बहाली के लिए और आईपीओ लाने वाली कंपनियों व बाजार की इंटरमिडियरीज (Intermediaries) में अनुशासन स्थापित करने के लिए सेफ्टी नेट की व्यवस्था अनिवार्य करना जरूरी है। 

साल 2008 से 2011 के बीच लाए गए आईपीओ के प्रदर्शन के विश्लेषण के दौरान सेबी ने पाया कि कुल 117 में से 72 (लगभग 62 फीसदी) शेयर अपनी लिस्टिंग की तिथि के छह महीने बाद अपने इश्यू प्राइस (Issue Price) से नीचे चल रहे थे। इन 72 में से 55 शेयर ऐसे थे जो अपने इश्यू प्राइस के मुकाबले 20 फीसदी से अधिक लुढक़ चुके थे। सेबी ने कहा है कि ऐसी स्थिति में यदि यह रुझान जारी रहा तो निवेशकों के मिजाज पर बुरा असर पड़ेगा और पूंजी बाजार से उनका भरोसा उठ जाएगा। ऐसे में रिटेल निवेशकों के पूंजी बाजार पर विश्वास को बनाए रखने के लिए सेफ्टी नेट उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है।
क्या है सेफ्टी नेट का प्रस्ताव?

यह प्रस्ताव सभी आईपीओ के लिए अनिवार्य होगा। सेफ्टी नेट उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी इश्यू के प्रमोटर (Promoter) की होगी। सेफ्टी नेट के प्रावधान के तहत अर्ह निवेशकों से शेयरों की खरीद उस शेयर के इश्यू प्राइस पर की जाएगी। यह सुविधा उन रिटेल निवेशकों को मिलेगी जिन्होंने किसी आईपीओ में 50 हजार रुपए तक का निवेश किया हो। सेफ्टी नेट उपलब्ध कराने वाले (प्रमोटर) का उत्तरदायित्व इश्यू के आकार का अधिकतम पांच फीसदी होगा। उदाहरण के तौर पर यदि किसी इश्यू का आकार 1000 करोड़ रुपए हो तो प्रमोटर अधिकतम 50 करोड़ रुपए के शेयर इश्यू प्राइस पर खरीदेगा। यदि सेफ्टी नेट के दायरे में आने वाले शेयरों की संख्या उस इश्यू के आकार के पांच फीसदी से अधिक हो जाती है तो निवेशकों से शेयरों की इस तरह से आनुपातिक आधार पर खरीद की जाएगी कि प्रमोटर का अधिकतम उत्तरदायित्व पांच फीसदी हो।

कब लागू होगा यह प्रावधान?

सेफ्टी नेट का प्रावधान केवल उसी स्थिति में लागू होगा जब किसी शेयर की कीमत उसके इश्यू प्राइस से 20 फीसदी से अधिक गिर गई हो। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रावधान के लागू होने के लिए जरूरी गिरावट बाजार सूचकांक के मुकाबले 20 फीसदी से अधिक होनी चाहिए। इसके लिए बीएसई-500 (BSE-500) या सीएनएक्स-500 (CNX-500) को बेंचमार्क बनाया जा सकता है। इस प्रावधान के लिए कीमत की गणना शेयर की लिस्टिंग से तीन महीने की अवधि के भीतर उसके वॉल्युम-वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस (Volume Weighted Average Market Price) के आधार पर होगी।

आइए इसे सेबी के डिस्कशन पेपर में दिए गए उदाहरणों के जरिए इसे समझते हैं। मान लीजिए किसी शेयर की लिस्टिंग प्राइस 100 रुपए है और उसकी लिस्टिंग की तिथि पर बेंचमार्क सूचकांक 1000 पर है। तीन महीने के बाद उस शेयर की वॉल्युम-वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस 79 रुपए (21 फीसदी की गिरावट) रह गई और बेंचमार्क सूचकांक 1000 (शून्य फीसदी की गिरावट) पर ही है। चूंकि तुलनात्मक गिरावट 21 फीसदी (21 फीसदी- 0 फीसदी) है, ऐसी स्थिति में सेफ्टी नेट का प्रावधान लागू हो जाएगा। 

लेकिन अगर तीन महीने के बाद उस शेयर की वॉल्युम-वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस 79 रुपए (21 फीसदी की गिरावट) हो और बेंचमार्क सूचकांक 900 (10 फीसदी की गिरावट) पर हो, तो तुलनात्मक गिरावट 11 फीसदी (21 फीसदी- 10 फीसदी) होगी, ऐसे में सेफ्टी नेट का प्रावधान लागू नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि अगर किसी शेयर विशेष के निवेशक को सेफ्टी नेट के प्रावधान का लाभ मिलना है तो उस शेयर की गिरावट बाजार के सूचकांक के मुकाबले काफी तीखी होनी चाहिए।

अगर तीन महीने के बाद उस शेयर की वॉल्युम-वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस 69 रुपए (31 फीसदी की गिरावट) हो और बेंचमार्क सूचकांक 900 (10 फीसदी की गिरावट) पर हो, तो तुलनात्मक गिरावट 21 फीसदी (31 फीसदी- 10 फीसदी) होगी, ऐसी स्थिति में सेफ्टी नेट का प्रावधान लागू हो जाएगा। 

कई दिक्कतें हैं इसमें

सेबी के डिस्कशन पेपर में एक और उदाहरण दिया गया है। अगर तीन महीने के बाद उस शेयर की वॉल्युम-वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस 89 रुपए (11 फीसदी की गिरावट) हो और बेंचमार्क सूचकांक 1100 (10 फीसदी की बढ़ोतरी) पर हो, तो तुलनात्मक गिरावट 21 फीसदी (11 फीसदी- (-10 फीसदी)) होगी, लेकिन इसके बावजूद सेफ्टी नेट का प्रावधान लागू नहीं होगा क्योंकि शेयर की कीमत में आई गिरावट 20 फीसदी से कम है। बाजार के जानकार इस प्रावधान को विरोधाभासी बता रहे हैं। एक ओर यह कहा गया है कि बेंचमार्क सूचकांक के मुकाबले किसी शेयर विशेष में 20 फीसदी की गिरावट आ जाने पर उस शेयर पर सेफ्टी नेट का प्रावधान लागू हो जाएगा। लेकिन दूसरी ओर यह भी कह दिया गया है कि उस शेयर विशेष में भी 20 फीसदी से अधिक गिरावट आनी चाहिए। यह वाकई अजीब है कि कुल मिला कर बाजार का प्रदर्शन अच्छा होने के बावजूद अगर किसी कंपनी का प्रदर्शन खराब हो, तो भी इस शेयर विशेष के निवेशक को सेफ्टी नेट की राहत नहीं मिलेगी। 

बाजार के जानकारों की मानें तो इस प्रस्ताव में कई और कमियां हैं। इश्यू के आकार पर पांच फीसदी की सीमा लगा देने पर भी कई जानकार ऐतराज जता रहे हैं। उनका कहना है कि 1000 करोड़ रुपए के आकार वाले आईपीओ में प्रमोटर का उत्तरदायित्व महज 50 करोड़ रुपए का होगा, जो निवेशकों की दी जाने वाली राहत के लिहाज से काफी कम है और प्रावधान की मूल भावना ही खिलाफ है।

किसी आईपीओ में आवेदन करने वाले रिटेल निवेशक के लिए ऊपरी सीमा दो लाख रुपए की होती है। लेकिन इस प्रावधान में केवल पचास हजार रुपए तक का निवेश करने वाले लोगों को शामिल किए जाने की बात कही गई है। यह बात भी प्रावधान की मूल भावना के विरुद्ध है। केवल पचास हजार रुपए तक के निवेश पर सेफ्टी नेट उपलब्ध कराने के प्रावधान से रिटेल निवेशक अपनी पूरी सीमा का इस्तेमाल करने से खुद को रोकेंगे और महज 50 हजार रुपए का ही निवेश करेंगे।

जानकारों के एक समूह का कहना है कि शेयर की कीमत के ऊपर-नीचे जाने का जोखिम शेयर बाजार का अनिवार्य हिस्सा है। ऐसे में निवेशकों के एक वर्ग को इस जोखिम से बचाने के प्रावधान की वजह से अनावश्यक जटिलताएं उत्पन्न होंगी। दूसरी बात यह कि अगर यह प्रावधान लागू कर दिए जाएं तो उसके बाद आईपीओ लाने वाले प्रमोटर इस बात को ध्यान में रखते हुए इश्यू प्राइस तय करेंगे।

शेयर बाजार के कुछ जानकार यह भी कह रहे हैं कि कीमत के ऊपर-नीचे जाने के जोखिम से निवेशकों को बचाने के बजाय सेबी को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आईपीओ में धोखाधड़ी करने वाले लोगों से निवेशकों को बचाने के प्रावधान करे। सेबी ने पिछले दिनों उन कंपनियों पर कार्रवाई की है जिन्होंने अपने आईपीओ के लिए कृत्रिम मांग उत्पन्न कराई और उगाही गई पूंजी का एक बड़ा हिस्सा इधर-उधर कर दिया। सेबी ने अपनी जांच में सात कंपनियों का नाम लिया है। कहने का मतलब यह है कि आईपीओ में निवेशकों का पैसा डूबने के पीछे प्रमोटर्स की धोखाधड़ी जैसी वजहें प्रमुख हैं जिन्हें सेफ्टी नेट के प्रावधान के जरिए नहीं रोका जा सकता। इनको रोकने के लिए सेबी को बाजार की शुचिता बनाए रखने के लिए अपनी जांच प्रक्रियाओं में अधिक तत्पर होना होगा।

बाजार के जानकारों के एक वर्ग का कहना है कि इश्यू के आकार के पांच फीसदी शेयरों की खरीदारी के मुकाबले धोखाधड़ी करने वालों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई निवेशकों के लिए अधिक बेहतर उपाय है। 
(मनी मंत्र में प्रकाशित)